कविवर रहीम का एक दोहा है- ‘धनि रहीम जल पंक को लघु जिय पियत अघाय, उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाय।’ रहीम कहते हैं कि कीचड़ के ऊपर ठहरा या तैरता हुआ पानी धन्य है जिसे पीकर छोटे-छोटे जीव अर्थात कीड़े-मकोड़े तृप्त होकर प्रसन्न हो जाते हैं, लेकिन समुद्र की विशाल जलराशि का क्या महत्व, जब उस समुद्र से सारा संसार प्यासा ही लौट जाता है।


समुद्र के किनारे सैर करने जाना हो अथवा समुद्री यात्रा पर निकलना हो, पीने का साफ पानी साथ लेकर जाना पड़ता है। समुद्र में पानी की कमी नहीं, लेकिन उसका पानी पीने योग्य नहीं। इस कारण समुद्र की विशाल जलराशि मनुष्य के लिए बेकार है। इसीलिए अनुपयोगी होने पर बड़े महत्व की वस्तु भी कभी-कभी प्रशंसा के योग्य नहीं होती।

कहने का तात्पर्य यही है कि जो वस्तु किसी के काम आए, चाहे वह कम मात्रा में ही क्यों न हो, महत्वपूर्ण होती है, और जो वस्तु किसी के कुछ काम ही न आए, वह अधिक मात्रा में उपलब्ध होने पर भी महत्वहीन अथवा बेकार होती है। महत्व आकार या विस्तार का नहीं, उपयोगिता का होता है। जीवन के हर क्षेत्र में ये बातें लागू होती हैं। पैसे को ही ले लीजिए। कई लोगों के पास बहुत पैसा होता है, जबकि कई लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत कम पैसा होता है या अपने जीवन-यापन भर के लिए भी उसके पास पैसे नहीं हैं। रोजाना संघर्ष करना पड़ता है, परंतु जो लोग अपने पास कम पैसा या न्यून साधन होने पर भी दूसरों की मदद करने को तत्पर रहते हैं, वे सचमुच धन्य और प्रशंसा के पात्र हैं।

जबकि जो लोग समर्थ होते हुए भी किसी के काम नहीं आते या नहीं आ सकते, उनकी कैसी बड़ाई? वे प्रशंसा नहीं, निंदा करने के लायक होते हैं। वस्तुओं का महत्व उनकी उपयोगिता से ही आंका जाता है और मनुष्यों का महत्व उनके स्वभाव अथवा गुणों से। सद‌्गुणों से संपन्न व्यक्ति ही सब जगह सम्मान पाता है। दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता। जो लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं अथवा निरर्थक व अनुपयोगी कार्यों में लगे रहते हैं वे भी समाज व राष्ट्र के लिए बेकार हैं।


शारीरिक तौर पर भी कुछ लोग सामान्य होते हैं, तो कुछ बहुत अधिक ताकतवर होते हैं। यदि किसी कमजोर अथवा असहाय की रक्षा की बात आती है तो वह व्यक्ति ही प्रशंसा का पात्र है जो संकट के समय किसी की रक्षा करने के लिए आगे आए। व्यक्ति ताकतवर होते हुए भी यदि किसी कमजोर व्यक्ति की रक्षा करने के लिए आगे नहीं आता तो उसकी ताकत का कोई सकारात्मक उपयोग न होने के कारण वह निरर्थक है। इसी प्रकार से कुछ लोग अनेक विद्याओं से सम्पन्न होते हैं लेकिन यदि वे अपना ज्ञान समाज या राष्ट्र के हित के लिए उपयोग में नहीं लाते तो ऐसा ज्ञान किस काम का?

कहने का तात्पर्य यही है कि कोई भी वस्तु अल्प मात्रा में हो या अत्यंत लघु आकार में, उसकी उपयोगिता ही उसे महत्वपूर्ण व प्रशंसनीय बनाती है। यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। यदि हमारे व्यवहार में अपेक्षित जीवनोपयोगी छोटी-छोटी बातों का समावेश नहीं होगा तो न तो हमारा व्यक्तित्व ही प्रभावशाली हो सकेगा और न ही हम समाज में प्रशंसा व प्रेम पाने के अधिकारी हो सकेंगे।