नई दिल्ली।   पाकिस्तान ने दशकों से अफगान मामलों में एक सक्रिय, लेकिन नकारात्मक भूमिका निभाई है और इस्लामाबाद काबुल में एक कमजोर सरकार चाहता है।
 
एक रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में भारत की कूटनीतिक और वाणिच्यिक उपस्थिति और इसके लिए अमेरिका का समर्थन पाकिस्तान की चिंता को बढ़ाता है। भारत ने यहां भारी निवेश किया हुआ है। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत का असर कम हो और पाकिस्तान के खिलाफ अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल न हो। वहीं भारत की कोशिश है कि उसके अफगान सरकार के साथ अच्छे ताल्लुक बरकरार रहें और तालिबान का असर इतना न बढ़े कि वो भारत के लिए मसला पैदा करे।
अफगानिस्तान में भारतीय हित पाकिस्तान के साथ व्यापक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता से उपजा है, जो मध्य एशिया के साथ मजबूत और प्रत्यक्ष वाणििज्यक और राजनीतिक संबंध स्थापित करने के भारतीय प्रयासों को बाधित करता है।
 आतंकी संगठनों को समर्थन 
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान में मौजूद अफगान तालिबान जैसे भारत विरोधी आतंकी संगठनों को समर्थन देना जारी है।
आतंकियों को पनाह
रिपोर्ट में कहा गया है कि, पाकिस्तान तालिबानी और हक्कानी नेटवर्क के आतंकवादियों को अपने यहां सुरक्षित पनाह दे रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने लंबे समय से पाकिस्तान में आतंकी पनाहगाहों को अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना है।
  
अस्थिर सरकार
सीआरएस ने कहा, पाकिस्तान कमजोर और अस्थिर अफगानिस्तान में ऐसी सरकार चाहता है, जो उसके इशारों पर चले। पाक वहां पश्तून जातीय के नेतृत्व वाली सरकार बनाने के प्रयास में है। क्योंकि पाकिस्तान में पश्तून एक बड़ा अल्पसंख्यक है।

मिलिट्री विद्रोही
सीआरएस ने अपनी रिपोर्ट में अफगान मिलिट्री विद्रोही होने और सरकार के गिरने की आशंका भी जाहिर की है। सीआरएस ने चेतावनी दी है कि अमेरिका-तालिबान वार्ता रद्द होने के बाद तालिबान फिर से पूरे देश में अपना कब्जा जमा सकता है।