कुछ लोग छोटी-मोटी बीमारी का इलाज खुद करने की कोशिश करते हैं और सबसे बड़ी गलती एंटीबायोटिक दवाएं लेकर करते हैं। सर्दी-खांसी हुई, बुखार आया या गला खराब हुआ तो फटाफट एंटीबायोटिक्स ले लीं और वह भी डॉक्टर की सलाह के बिना। सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि बैक्टीरिया से पैदा होने वाली बीमारियों से ही एंटीबायोटिक दवाएं लड़ती हैं। 
एंटीबायोटिक्स डॉक्टर की सलाह के बगैर न लेने की गलती भारी पड़ सकती है, क्योंकि हर बीमारी के लिए अलग तरह के एंटीबायोटिक्स होते हैं और इन्हें मरीज डॉक्टर की सलाह से ही समझ सकते हैं। यहां लोग एक बड़ी गलती और करते हैं। उन्हें डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक कोर्स पूरा करना चाहिए। अगर तबीयत में सुधार भी दिखे तो भी जितने दिन तय किए गए हैं तब तक दवाओं का सेवन जरूर करें। आधा-अधूरा लेने से नुकसान होगा क्योंकि इससे बीमारी के बैक्टीरिया ज्यादा मजबूत हो जाते है और फिर से संक्रमण करते हैं।
World Antibiotic Awareness Week : जानें क्यों बेअसर हो रही हैं एंटीबायोटिक दवाएं
जर्नल एंटीमाइक्रोबियल एजेंट और कीमोथेरेपी में छपे अध्ययन के अनुसार कई लोगों को डॉक्टर के लिखे बिना एंटीबायोटिक्स इस्तेमाल करने की आदत होती है। वे दवा की दुकानों या अपने घर में ही अलमारियों में बची हुई दवाओं पर भरोसा करते हैं और इससे साथ ही एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को आस-पास फैलाते हैं और हानिकारक नतीजों का कारण बनते हैं।
क्या बीमार होने पर हमें यह एंटीबायोटिक लेने चाहिए?
जानिए क्या होता है नुकसान
सही जानकारी के अभाव में शरीर के लिए गैर जरूरी एंटीबायोटिक दवाएं लेने के गंभीर दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। इनका ज्यादा इस्तेमाल लिवर और किडनी पर बुरा असर डालता है। इतना बुरा असर की दोनों फेल भी हो सकते हैं। इसका अधिक सेवन मस्तिष्क के लिए भी गंभीर चिंता विषय है। लोगों के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि दो-चार बार एंटीबायोटिक्स ले ली लेकिन उससे कोई दिक्कत नहीं हुई तो वह इस प्रक्रिया को जारी रखते हैं। कई बार इनके गंभीर दुष्प्रभाव काफी समय बाद दिखते हैं, लेकिन तब तक बहुत देर हो जाती है। इनका सेवन एलर्जी भी पैदा कर सकता है।
रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों के अनुसार, एंटीबायोटिक प्रतिरोधी रोगजनकों से संक्रमित 2 मिलियन से अधिक अमेरिकियों के साथ संयुक्त राज्य में प्रति वर्ष एंटीबायोटिक प्रतिरोध 23,000 से अधिक मौतों का कारण बनता है।
जब एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल होता है तो शरीर में मौजूद बैक्टीरिया अपनी जेनेटिक संरचना में बदलाव लाने लगते हैं। ये बैक्टीरिया पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को बैक्टीरिया का ऑटो इम्यून होना कहा जाता है। यह वह स्थिति है जब बैक्टीरिया पर दवाओं का प्रभाव समाप्त हो जाता है। एंटीबायोटिक्स का लगातार सेवन करना या इसे आधे-अधूरे तरीके से लेने से एंटी माइक्रोबायल रेजिस्टेंस (एमएमआर) की समस्या हो जाती है। इनका साइड इफेक्ट भी होता है जिसमें सूजन, सांस लेने संबंधी दिक्कतें पैदा हो जाती है। इसके प्रभाव से त्वचा पर रैशेज भी दिख सकते हैं। व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है।
कैसे बचें
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डॉक्टरों को भी सलाह दी है कि एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल सीमित मात्रा में करें। छोटी-मोटी बीमारियों से लड़ने के लिए व्यक्ति विटमिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें, नियमित सूखे मेवे (ड्राई फ्रूट्स) लें और हरी सब्जियों को अपने खाने का हिस्सा बनाएं। इनके सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों के मुताबिक एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस से साल में दुनिया भर में सात लाख मौतें होती हैं। वर्ष 2050 तक इन मौतों का आंकड़ा प्रति वर्ष एक करोड़ तक पहुंच जाएगा।
इन बातों का ध्यान रखें
सबसे पहले तो खुद डॉक्टर न बनें और डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक न लें। डॉक्टर की सलाह पर ही उचित मात्रा में, सही समय पर, सही दवा लें।
डॉक्टर यह जरूर बताते हैं कि एंटीबायोटिक कब तक लेना है, जैसे कि मान लो सात दिन कहा। इस बात को पूरी तरह फॉलो करें। पूरा कोर्स लें। जितनी दिनों की दवाई दी हो, उतने दिन दवा जरूर लेनी चाहिए अब भले ही आप बेहतर महसूस कर रहे हों।  अगर ऐसा नहीं किया तो शरीर में मौजूद बैक्टीरिया प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकते हैं जिससे उन पर दवाओं का असर नहीं होता। 
इस बात को अच्छे से समझ लें कि फ्लू या सर्दी-जुकाम जैसे वायरस से होने वाले संक्रमण में एंटीबायोटिक काम के नहीं होते। एंटीबायोटिक दवाएं, बैक्टीरिया से होने वाले रोगों से लड़ने में तो मददगार हैं लेकिन वायरस से होने वाली बीमारियों में नहीं।